| संग्रहाचे नाव | एकूण रचना | गझलांची संख्या | प्रतिशत प्रमाण |
|---|---|---|---|
| रूपगंधा | ७२पैकी | ०७गझला | ९.७२ % |
| रंग माझा वेगळा | ९२ पैकी | ३२ गझला | ३४.७८% |
| एल्गार | ९६ पैकी | ९१ गझला | ९४.७९% |
| झंझावात | ८९ पैकी | ७६ गझला | ८५.३९% |
| सप्तरंग | ८१ पैकी | ५१ गझला | ६२.९६% |
| रसवंतीचा मुजरा |
८३ पैकी | ०६ गझला | ७.२३ % |
| एकूण | ५१३पैकी | २६३गझला | ५१.२७% |
वरील सारणीमध्ये आलेल्या सांख्यिकीय विश्लेषणाचा विचार केल्यास, सुरेश भटांचा गझलरचनेकडे असणारा कल दर्शविणाऱ्या खालील निष्कर्षाप्रत पोहचू शकतो.
१. एकूण ५१३ पैकी २६३ गझला म्हणजेच निम्म्याहून अधिक (५१.२७%) रचना गझल काव्यप्रकारातील आहेत. गझलेव्यतिरिक्त इतर काव्यप्रकारातील कवितांमध्ये काही गीते आणि मोजक्या मुक्तछंदातील कविता आहेत. 'रंग माझा वेगळा' हे त्यांच्या काव्यप्रवासातील असे वळण आहे, जेथे त्यांचे गीतलेखन मागे पडलेले दिसते. सुरेश भटांची काव्यजाणीव कशी विकसित होत गेली, याचा टप्प्यांनुसार विचार करायचा म्हटले तर त्यांचा संग्रहांचा क्रम पुढीलप्रमाणे विचारात घ्यावा लागेल -
१) रसवंतीचा मुजरा, २००७
२) रूपगंधा, १५ मार्च १९६१
३) रंग माझा वेगळा, १९७४
४) एल्गार, १९८३
५) झंझावात, १९९४
६) सप्तरंग, २००२
२. 'गझल हा एक प्रभावी काव्यप्रकार असल्यामुळे गझल लिहिणारा आधी कवी असला पाहिजे. ही गझलेची पूर्व अट आहे', हे सुरेश भटांनी बाराखडीत सांगितले आहे. त्यांचा एकूणच काव्यप्रवास बघतात कवी असणे वरील सांख्यिकीय विश्लेषण बघता सिद्ध होते.
३. गझल ह्या प्रभावी काव्यप्रकाराकडे त्यांचा कल 'रंग माझा वेगळा' (३४,७८%) ह्या संग्रहात वाढल्याचे दिसून येते.
४. १९७४ मध्ये प्रकाशित झालेल्या 'रंग माझा वेगळा' ह्या संग्रहानंतर १९८३ मध्ये 'एल्गार' हा संग्रह प्रकाशित झाला. १९७४ ते १९८३ ह्या ९ वर्षांच्या कालखंडात सुरेश भटांचा गझलरचनेकडे झुकलेला कल परमोच्च बिंदूपर्यंत पोचल्याचे दिसते. 'एल्गार' मधील बहुतांश गझला गैरमुसलसल ह्या प्रकारातील असून आशयदृष्ट्या त्या अधिक परिपक्व आणि सकस आहेत. ह्या संग्रहात एकूण रचनांशी असलेले गझलेचे प्रमाण सर्वाधिक म्हणजे ९४.७९% एवढे आढळते.
५. या नंतरच्या 'झंझावात' (८५.३९%) आणि 'सप्तरंग' (६२.९६%) ह्या संग्रहात गझलरचनेचा कल हळूहळू कमी होताना दिसतो.
६. सुरेश भटांचा मरणोत्तर २००७ मध्ये प्रकाशित झालेला 'रसवंतीचा मुजरा' (७.२३%) ह्या संग्रहात गझलरचनेचे प्रमाण सर्वांत कमी झाल्याचे आढळते. इतर संग्रहात समाविष्ट होऊ न शकलेल्या रचनांचा समावेश ह्या संग्रहात असल्यामुळेही कदाचित असे घडले असावे.
ह्या २६३ गझलांमध्ये सुरेश भटांनी एकूण ४७ वृत्तांचा उपयोग केला आहे. त्यातील ४० अक्षरगणवृत्ते असून ७ मात्रावृत्ते आहेत. वृत्तानुसार गझलांची संख्या सारण्या करून पुढीलप्रमाणे दर्शविली आहे. प्रस्तुत ग्रंथातील 'गझलेच्या वृत्तांचे वर्गीकरण' या प्रकरणात प्रत्येक वृत्ताची लगावली उदाहरणासह आलेली आहे.
सारणी क्र. १ । ६ वृत्ते
| वृत्ताचे नाव | गझलांची संख्या |
|---|---|
| आनंदकंद | ३० |
| मंजुघोषा | २८ |
| व्योमगंगा | २६ |
| देवप्रिया | १६ |
| वियद्गंगा | १५ |
| राधा | १२ |
| एकूण | १२८ |
| वृत्ताचे नाव | गझलांची संख्या |
|---|---|
| मंदाकिनी | ११ |
| हिरण्यकेशी | १० |
| लज्जिता | १० |
| स्रग्विणी | ८ |
| सती त्रिरावृत्ता | ८ |
| एकूण गझला | ४७ |
| वृत्ताचे नाव | गझलांची संख्या |
|---|---|
| रंगराग | ६ |
| मेनका | ६ |
| मृगाक्षी | ६ |
| विद्युल्लता | ६ |
| वैशाख | ४ |
| भामिनी | ४ |
| वीरलक्ष्मी | ३ |
| पंचचामर | २ |
| नाराच द्विरावृत्ता | २ |
| स्वानंद सम्राट | २ |
| साशंक | २ |
| एकूण | ४३ |
| वृत्ताचे नाव | गझलांची संख्या |
|---|---|
| आनंद त्रिरावृत्ता | १ |
| भुजंगप्रयात | १ |
| वैखरी | १ |
| सौदामिनी | १ |
| सुकेशी | १ |
| 'सु' कामिनी | १ |
| विभावरी | १ |
| प्रभाव | १ |
| कामिनी | १ |
| पुष्पप्रीति | १ |
| प्रसूनांगी + लगा | १ |
| मरीचिका | १ |
| कलावती | १ |
| शरयू | १ |
| श्येनिका | १ |
| *निर्विकार | १ |
| *आरास | १ |
| *चंद्रकोर | १ |
| एकूण | १८ |
| वृत्ताचे नाव | गझलांची संख्या |
|---|---|
| बालानंद द्विरावृत्ता | ११ |
| अनलज्वाला | ७ |
| *श्रेय | ४ |
| पादाकुलक | २ |
| परिलीना | १ |
| लवंगलता | १ |
| हरिभगिनी | १ |
| एकूण गझला |
२७ |
